माशूका की कथित बेवफ़ाई पर लिखी ये पंक्तियां किसी शायर या कवि ने नहीं
लिखी हैं. इन्हें लिखा है दुबई के शासक शेख़ मोहम्मद अल मक़तूम ने, जिनकी
पत्नी राजुकमारी हया बिंत अल हुसैन दुबई छोड़कर लंदन चली गई हैं.
संयुक्त अरब अमीरात के शाही परिवार में ऐसा होना अपने आप में बेहद अजीब है.
बताया
जा रहा है कि राजकुमारी फ़िलहाल सेट्रल लंदन के किसी टाउनहाउस में हैं. राजुकमारी हया अक्सर घुड़दौड़ में हिस्सा लिया करती थीं लेकिन वो इस साल
हुए रॉयल एस्कॉट से ग़ैरहाज़िर रहीं.
कुछ सूत्रों ने बीबीसी को बताया है कि राजकुमारी हया को अपनी जान का ख़तरा महसूस हो रहा था क्योंकि वो अपने पति के ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रही थीं.
राजकुमारी हया का जन्म मई 1974 में हुआ है. उनके पिता जॉर्डन के किंग हुसैन थे जबकि मां महारानी आलिया अल-हुसैन थीं.
जब राजकुमारी हया सिर्फ़ तीन साल की थीं तब एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में उनकी मां की मौत हो गई थी.
राजकुमारी
हया ने अपना बचपन ब्रिटेन में बिताया. उन्होंने दो प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई पूरी की. इनमें ब्रिस्टल का बैडमिंटन स्कूल और डोरसेट का ब्रयानस्टन
स्कूल शामिल हैं.
इसके बाद उन्होंने ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी से राजनीति, दर्शन और अर्थशास्त्र में पढ़ाई की.
अपने
कुछ पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया था उन्हें फै़लकोनरी (बाज़ को
पालना) शूटिंग और बड़ी मशीनों का शौक है. इसके अलावा उन्होंने दावा किया था
कि जॉर्डन में बड़े ट्रक चलाने का लाइसेंस पाने वाली वो एकमात्र महिला
थीं.
राजकुमारी हया को घुड़सवारी का भी शौक है और जब वो 20 साल की थीं तो उन्होंने घुड़सवारी को अपने करियर के तौर पर चुना था.
घुड़सवारी
में राजकुमारी हया ने साल 2000 के ओलंपिक खेलों में जॉर्डन का प्रतिनिधित्व भी किया था, वो उस ओलंपिक खेलों में अपने देश की ध्वजवाहक भी
थीं.
10 अप्रैल 2004 को राजकुमारी हया ने दुबई के शासक और संयुक्त अरब अमीरात
के उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री शेख़ मोहम्मद के साथ निकाह किया. उस समय राजकुमारी की उम्र 30 साल थी जबकि शेख़ मोहम्मद 53 साल के थे.
राजकुमारी हया उनकी छठीं पत्नी थीं. बताया जाता है कि शेख मोहम्मद के अलग-अलग पत्नियों से कुल 23 बच्चे हैं.
राजकुमारी
की तरह शेख मोहम्मद को भी घोड़ों का शौक था. वो घोड़ों के अस्तबल गो-डोल्फिन के मालिक़ भी थे. इन दोनों की शादी अम्मान में हुई थी.
शादी
के बाद राजकुमारी हया ने कई बार शेख मोहम्मद के साथ अपने रिश्तों के बारे
में बताया कि वो बहुत ख़ुश हैं. दोनों ने अपनी ख़ुशहाल ज़िंदगी को दर्शाने
वाली पेंटिंग भी बनवाई.
अमीरात वुमेन मैगज़ीन के 2016 के अंक
में राजकुमारी हया ने शेख मोहम्मद के बारे में कहा था, ''वो जो कुछ भी
करते हैं तो अद्भुत होता है. मैं हर रोज़ ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करती
हूं कि मैं उनके इतना क़रीब हूं.''
इसी मैगज़ीन में राजकुमारी हया और शेख़ मोहम्मद को एक परफेक्ट जोड़े को तौर पर पेश करते हुए भी आर्टिकल प्रकाशित किया गया था.
Friday, July 5, 2019
Tuesday, July 2, 2019
巴西石油计划威胁南大西洋生物多样性
当巴西环境和可再生自然资源管理局( )官员谏言反对拍卖海洋保护区附近的石油勘探区时,该机构负责人爱德华多·比姆的回应是“会再考虑”。在环境部执行秘书告知其该议题具有“战略意义”后,比姆撰写了一份报告推翻手下的观点,允许进行拍卖。
新的勘探区位于阿布洛霍斯国家公园内,该公园是南大西洋海洋生物多样性最为丰富的区域,有着独特的珊瑚物种,并且是座头鲸和绿海龟的育幼地。
这一消息给巴西环保主义者带来了又一次打击。去年11月,极右翼政治家雅伊尔·博尔索纳罗当选国家总统,他认为巴西为保护环境做出的贡献已经超出了自己的本份。上台以来,博尔索纳罗的团队不仅削减了环境部的预算,还任命卡多·萨勒斯为环境部长,这些都让环境部的工作受到了冲击。萨勒斯曾是一名律师,对待环境违规企业比自己员工还亲切。
巴西气候变化专家小组“气候观察站”执行秘书卡洛斯•里特尔称此次石油区拍卖事件是“残暴且不负责任”的表现。
“政府发出的信号是,一切有待保护的环境都要让路,”他说,“这是在鼓励不惜一切代价促进经济活动。”
Ibama必须要批准国家石油管理局提议的所有石油区的拍卖。在10月份的这次拍卖中,Ibama的技术人员曾反对将石油管理局列出的36个待拍石油区块中的7个纳入拍卖名单。
上个月美联社和巴西圣保罗州报获得的文件表明该裁定遭到了否决。文件显示,Ibama的一项支持最初决定的研究警告称,即便最近的石油区离阿布洛霍斯公园有300公里之远,可一旦有某块石油区发生泄漏,还是会破坏这座保护公园。
国家石油管理局没有透露是否已有公司有意参与这些石油区的竞标,但行业观察家认为此次拍卖将吸引壳牌、雪佛龙、中石油等在巴西有业务活动的跨国公司。这些石油区块的估价为接近于10亿美元。
中国一直以来都是巴西石油部门最高产的投资者之一,在管道建设和石油换贷款合同等项目上投了近400亿美元。
但直到最近,勘探海上石油区才成为中国公司在巴西的一个目标。2010年巴西宣布在海底盐结壳下发现巨大的石油储备后,中国开始投资巴西的石油部门。5年过去了,中国注资的三家公司:中化巴西石油公司、雷普索尔中石化和巴西石油已然跻身巴西十大石油和天然气生产公司之列。
5月初,中国海油巴西有限公司总裁盛建波表示公司希望扩大在巴西的生产。
然而,最新的争议可能会让投资者感到不安。拍卖过后,购得勘探权的公司仍需获得Ibama的环境许可证才能继续投资。萨勒斯在国会回答针对此事的提问时称,
巴西近年来一直在加强对海洋生物多样性的保护,并于去年3月宣布将把海洋保护区扩大16倍,并建立新的海洋保护单位,以便限制捕鱼和保护鱼类种群。
就在3月,萨勒斯本人也强调了保护海洋生物的必要性。“海洋是环境保护和保育的新前沿,”他在内罗毕联合国环境大会上的演讲中说。
但对“气候观察站”的特里尔来说,这明显是句空话。他担心Ibama会面临巨大压力,会违背技术人员的判断,发放环境许可证。
“这说明Ibama只是个摆设,”他说。
博尔索纳罗就任以来,Ibama一直遭到猛烈的攻击。1月,先是预算被削减,新闻办公室被裁撤,紧接着其前任负责人辞职。过去几周里,政府开始提前发布有关Ibama防止森林砍伐活动的信息。批评人士认为,这种做法极有可能会导致Ibama活动的失败。
环保主义者认为,阿布洛霍斯可能只是开始,其他保护区附近也有石油和天然气储备。去年12月Ibama就曾否决道尔达公司在亚马逊河口钻探石油和天然气的提案。
仍有可能会拒绝发放许可证,这将带来投资损失。
“如果Ibama说不行,那就是不行,”他说,“那么买到勘探权(的公司)就要自认倒霉。”
瓦加斯基金会大学金融学教授、石油行业专家拉菲尔·施奥泽表示,该事件将影响公司对政府的信任,质疑政府是否有能力为其提供合法安全的环境。
“当国家石油管理局提出拍卖的时候,所有的竞标参与方都觉得一切没问题。但是,显然找不到石油的地质风险是存在的,但环境许可证相关的风险应该是在此之前解决了的,”拉菲尔·施奥泽说。
施奥泽表示,官方建议被推翻给石油企业增加了一层风险,所以如果没有投资者竞标阿布洛霍斯附近的石油区,他也不会惊讶
新的勘探区位于阿布洛霍斯国家公园内,该公园是南大西洋海洋生物多样性最为丰富的区域,有着独特的珊瑚物种,并且是座头鲸和绿海龟的育幼地。
这一消息给巴西环保主义者带来了又一次打击。去年11月,极右翼政治家雅伊尔·博尔索纳罗当选国家总统,他认为巴西为保护环境做出的贡献已经超出了自己的本份。上台以来,博尔索纳罗的团队不仅削减了环境部的预算,还任命卡多·萨勒斯为环境部长,这些都让环境部的工作受到了冲击。萨勒斯曾是一名律师,对待环境违规企业比自己员工还亲切。
巴西气候变化专家小组“气候观察站”执行秘书卡洛斯•里特尔称此次石油区拍卖事件是“残暴且不负责任”的表现。
“政府发出的信号是,一切有待保护的环境都要让路,”他说,“这是在鼓励不惜一切代价促进经济活动。”
Ibama必须要批准国家石油管理局提议的所有石油区的拍卖。在10月份的这次拍卖中,Ibama的技术人员曾反对将石油管理局列出的36个待拍石油区块中的7个纳入拍卖名单。
上个月美联社和巴西圣保罗州报获得的文件表明该裁定遭到了否决。文件显示,Ibama的一项支持最初决定的研究警告称,即便最近的石油区离阿布洛霍斯公园有300公里之远,可一旦有某块石油区发生泄漏,还是会破坏这座保护公园。
国家石油管理局没有透露是否已有公司有意参与这些石油区的竞标,但行业观察家认为此次拍卖将吸引壳牌、雪佛龙、中石油等在巴西有业务活动的跨国公司。这些石油区块的估价为接近于10亿美元。
中国一直以来都是巴西石油部门最高产的投资者之一,在管道建设和石油换贷款合同等项目上投了近400亿美元。
但直到最近,勘探海上石油区才成为中国公司在巴西的一个目标。2010年巴西宣布在海底盐结壳下发现巨大的石油储备后,中国开始投资巴西的石油部门。5年过去了,中国注资的三家公司:中化巴西石油公司、雷普索尔中石化和巴西石油已然跻身巴西十大石油和天然气生产公司之列。
5月初,中国海油巴西有限公司总裁盛建波表示公司希望扩大在巴西的生产。
然而,最新的争议可能会让投资者感到不安。拍卖过后,购得勘探权的公司仍需获得Ibama的环境许可证才能继续投资。萨勒斯在国会回答针对此事的提问时称,
巴西近年来一直在加强对海洋生物多样性的保护,并于去年3月宣布将把海洋保护区扩大16倍,并建立新的海洋保护单位,以便限制捕鱼和保护鱼类种群。
就在3月,萨勒斯本人也强调了保护海洋生物的必要性。“海洋是环境保护和保育的新前沿,”他在内罗毕联合国环境大会上的演讲中说。
但对“气候观察站”的特里尔来说,这明显是句空话。他担心Ibama会面临巨大压力,会违背技术人员的判断,发放环境许可证。
“这说明Ibama只是个摆设,”他说。
博尔索纳罗就任以来,Ibama一直遭到猛烈的攻击。1月,先是预算被削减,新闻办公室被裁撤,紧接着其前任负责人辞职。过去几周里,政府开始提前发布有关Ibama防止森林砍伐活动的信息。批评人士认为,这种做法极有可能会导致Ibama活动的失败。
环保主义者认为,阿布洛霍斯可能只是开始,其他保护区附近也有石油和天然气储备。去年12月Ibama就曾否决道尔达公司在亚马逊河口钻探石油和天然气的提案。
仍有可能会拒绝发放许可证,这将带来投资损失。
“如果Ibama说不行,那就是不行,”他说,“那么买到勘探权(的公司)就要自认倒霉。”
瓦加斯基金会大学金融学教授、石油行业专家拉菲尔·施奥泽表示,该事件将影响公司对政府的信任,质疑政府是否有能力为其提供合法安全的环境。
“当国家石油管理局提出拍卖的时候,所有的竞标参与方都觉得一切没问题。但是,显然找不到石油的地质风险是存在的,但环境许可证相关的风险应该是在此之前解决了的,”拉菲尔·施奥泽说。
施奥泽表示,官方建议被推翻给石油企业增加了一层风险,所以如果没有投资者竞标阿布洛霍斯附近的石油区,他也不会惊讶
Tuesday, June 25, 2019
बिहारः जिनके बच्चे बुखार से मरे, पुलिस ने उन पर ही किया केस- ग्राउंड रिपोर्ट
बिहार की राजधानी पटना से लगभग 45 किमी दूर वैशाली के हरिवंशपुर गाँव में दिमाग़ी बुखार यानी एक्यूट
इन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से अब तक 11 बच्चों की मौत हो चुकी है.
पुलिस ने उन्हीं लोगों पर मुक़दमा दर्ज कर दिया जिनके बच्चे इस महामारी की चपेट में अपनी जान गंवा चुके हैं.इस बीमारी को प्रभावित इलाक़ों में स्थानीय लोग चमकी बुखार भी कह रहे हैं. इससे अब तक क़रीब डेढ़ सौ बच्चों की मौत हो चुकी है.
हरिवंशपुर के मुसहर टोला से सात बच्चे, पासवान टोला और ततवा टोला से दो-दो बच्चे इसकी चपेट में आए हैं.
मुसहर टोली में जहां से सबसे अधिक बच्चों की मौत हुई है, ज़िला प्रशासन का पिछले दो हफ़्तों से कैंप लगा है. अभी भी बुखार से तपते बच्चों का कैंप में आने का सिलसिला जारी है.
सोमवार की सुबह मुसहर टोले में बुखार से पीड़ित सात बच्चों की जांच हो चुकी थी. एक का बुखार इतना बढ़ गया था कि उसे भगवानपुर पीएचसी में रेफर कर दिया गया.
रोकथाम के नाम पर कैंप लगाकर तीन नर्सों को प्रखंड अस्पताल से उठाकर टोले में एक पेड़ के नीचे कुर्सी-चौकी देकर बिठा दिया गया है.
कहने को तो हरिवंशपुर में सरकारी मेडिकल कैंप है लेकिन उसमें इस्तेमाल की जाने वाली कुर्सियां और चौकी भी गांव वालों के ही हैं.
गाँव वाले इस वक़्त सबसे अधिक इस बात से डरे हैं कि पुलिस ने बच्चों की मौत पर विरोध-प्रदर्शन करने वाले पीड़ित परिजनों के ऊपर ही केस कर दिया है.
18 जून को जिस दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिमाग़ी बुखार के मरीज़ों का हाल जानने के लिए मुज़फ्फ़रपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल का दौरा करने गए थे. टोले वालों ने अपने यहां की समस्याओं मसलन पीने का पानी, बुखार से इलाज की व्यवस्था की मांग के साथ विरोध प्रदर्शन किया था.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एनएच-22 से होकर जाएंगे इसी को देखते हुए सड़क किनारे स्थित गाँव के लोगों ने रोड का घेराव कर दिया था.
पुलिस ने रोड घेराव के कारण ही 19 नामजद और 20 अन्य के खिलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है. नामजदों में क़रीब आधे दर्जन वे लोग हैं जिनके बच्चों की मौत बुखार से हुई है.
सुरेश कहते हैं, "हम लोग तो पहले से पीड़ित हैं जबकि पुलिस कहती है कि हमने रोड जाम किया. इसलिए केस किया गया है. हम क्या करें! कोई तो हमें देखने आता नहीं है. हमलोगों ने सोचा कि मुख्यमंत्री इस रास्ते से जाएंगे तो उनको रोककर अपना हाल सुनाएंगे. लेकिन वो हेलिकॉप्टर से गए."
पुलिस ने राजेश सहनी, रामदेव सहनी, उमेश मांझी और लल्लू सहनी को नामजद अभियुक्त बनाया है. इनके बच्चों की मौत भी दिमाग़ी बुखार से हुई है. कई लोग पुलिस के डर से गाँव के बाहर रह रहे हैं.
एफ़आईआर में 65 वर्षीय एक बुज़ुर्ग शत्रुघ्न सहनी का भी नाम है. शत्रुघ्न सहनी को काफ़ी पहले लकवाग्रस्त हो गए थे. इसकी वजह से न तो वो ठीक से चल फिर पाते हैं और न बोल बाते हैं.
दिमाग़ी बुखार में अपने दो बेटों को खोने वाले चतुरी सहनी कहते हैं, "सांसद जी आए तो थे. लेकिन क्या हुआ, पता नहीं."
चतुरी के दो ही बेटे थे, दोनों नहीं रहे. वो कहते हैं, "एक ही दिन दोनों चले गए. उसी में 95 हजार खर्च हो गया. किसी तरह गाँव वालों ने कुछ चंदा करके दे दिया. बाक़ी क़र्ज हो गया है. अब चुकाना है."
भगवानपुर प्रखंड अस्पताल के मेडिकल कैंप में अपने पाँच वर्षीय बेटे रोहित को दिखाने आए देवेंद्र सहनी का कहना है कि रात में कोई कैंप में नहीं था, इसलिए दिखा नहीं पाए थे. सुबह बता चला कि रोहित को 100 डिग्री बुखार है.
हरिवंशपुर की आबादी करीब पाँच हज़ार है. गाँव में सब तरह की जातियाँ हैं और सभी जाति का एक अलग टोला है. मसलन मुसहर टोली या मल टोली में मल्लाह और मुसहर जाति के लोग रहते हैं. दुसाध जाति का अलग दुसाध टोला है.
रामनाथ सहनी इशारा करते हुए कहते हैं, "रोड के उस पार बड़ी जातियों के लोग हैं. राजपूत, ब्राह्मण और भूमिहार. उसी पार यादव लोग भी हैं. लेकिन उधर किसी के लड़का को चमकी नहीं है. जो रोड के इस पार हैं, उनके घरों के बच्चे ही मरे हैं. उन लोग के पास अच्छा इलाज है. हम अगर कहीं अच्छे अस्पताल में जाते भी हैं तो भगा देता है लोग."
वो कहते हैं, "रोड के उस पार वालों ने भी विपदा में साथ निभाया है. पानी का इंतजाम हो या मीडिया से लेकर प्रदर्शन की बात हो, वो हमारे पीछे खड़े रहे हैं."
भगवानपुर पीएससी की रेखा कुमारी पिछले 12 दिनों से गांव में कैंप कर रही हैं.
आखिर हरिवंशपुर में बच्चे क्यों बीमार पड़ रहे हैं इस पर रेखा कहती हैं, "यहां सबसे बड़ी समस्या पानी की ही है. पूरे टोले में एक ही चापाकल था जिससे लोग पानी पीते हैं, अब वो भी सूख गया है. उस पानी का सैंपल रिसर्च वाले भी ले गए हैं. बाकी यहां बहुत सी दिक्क़तें हैं. जागरूकता का अभाव है. साफ़-सफ़ाई नहीं है, ग़रीबी है, अशिक्षा है."
Monday, June 10, 2019
ما دور الأفلام الإباحية في تطور الإنترنت؟
مدرسة الروضة البريئة المسماة " كيت مونستر" تحاول الاحتفال بفائدة الإنترنت للتسوق وإرسال تحيات عيد الميلاد.
في هذه الأثناء، جارها تريكي مونستر يصر على أن الناس يرون قيمة أكبر لها في النشاطات الحميمية.
هل هو محق ؟ إلى حد ما .
يحاول برنامج "50 شيئا شكلت الاقتصاد الحديث" التركيز على الاختراعات والأفكار التي ساعدت على خلق عالم الاقتصاد.
وتشير إحصائيات تبدو موثوقة إلى أن واحدا من سبع حالات بحث على الإنترنت هي عن مواد إباحية. هذه المعلومة ليست عديمة الأهمية، لكنها أيضا تعني أن ست حالات بحث مرتبطة بأشياء اخرى.
الموقع الإباحي الأكثر زيارة (بورن هاب) هو تقريبا بنفس شعبية مواقع مثل "نيت فليكس" و "لينكد إن". هذا يعني أنه في موقع متقدم، لكنه رقم 28 في الحقيقة .
لكن مسرحية "افينيو كيو" عرضت للمرة الأولى عام 2003 وقد يكون تريكي مونستر محقا في ذلك الوقت.
التكنولوجيا الحديثة تكون باهظة التكاليف، لذلك هناك حاجة لإيجاد سوق متخصص يساعدها على التطور.
وحين تصبح أرخص وموثوقة أكثر فإنها تصل إلى سوق أوسع ومجال واسع من الاستخدامات.
وهناك فرضية ترى ان الافلام الإباحية ساهمت في تطور الإنترنت ومجموعة كبيرة من فروع التكنولوجيا.
منذ بدايات الفن كان الجنس أحد مواضيعه. وجدت صور أرداف وأثداء وفروج وأعضاء ذكرية كبيرة بشكل مضحك في اللوحات المرسومة على جدران الكهوف.
وهناك صور لعمليات جماع منحوتة تعود إلى 11 ألف سنة على الأقل.
وقد نحت فنان من بلاد ما بين النهرين تمثالا طينيا لامرأة ورجل يمارسان الجنس بينما المرأة تحتسي الجعة قبل 4000 سنة تقريبا.
بمرور ألفي سنة أخرى صور فنانون من شعب الموتشي في بيرو عملية الجماع على قطع الخزف.
أما نصوص "كاما سوترا" الإيروتيكية فتعود إلى نفس المرحلة الزمنية.
لكن استخدام الفنون لتصوير أوضاع إيروتيكية لا يعتي أنها كانت وراء تطورها.
إذا فكرنا في تطور الطباعة مثلا، فإن الاقتصاد كان وراءها، على الرغم من طباعة نصوص إيروتيكية.
التصوير هو فن آخر يعود إلى القرن التاسع عشر وينافس في مصداقيته الأمثلة السابقة.
ضمن الاستوديوهات الرائدة في باريس ازدهرت ما تسمى باستوديوهات الفن.
كان الزبائن مستعدين للدفع بسخاء لتمويل التقنيات الجديدة. في مرحلة ما كان الحصول على صورة امرأة عارية يكلف أكثر من أجر بائعة هوى.
كلمة "بورنوغرافي" التي تشير إلى الإباحية مشتقة من التعبير اليوناني الذي يعني "الكتابة" و"المومس".
لكن الإباحية لم تكن وراء تطور السينما، لأسباب واضحة.
كانت الأفلام باهظة التكاليف، وكانت هناك حاجة لجمهور كبير من المشاهدين لتغطيتها.
ومع أن هناك أشخاصا مستعدون لدفع مبالغ مقابل مشاهدة صور إباحية في بيوتهم، فإن مشاهدة الأفلام وسط جمهور أمر محرج.
جاء أحد الحلول في ستينيات القرن الماضي: جهاز في مكان مغلق تضع فيه نقودا فيعرض الأفلام.
وكان بإمكان مقصورة واحدة أن تدر آلاف الدولارات أسبوعيا، لكن الخصوصية الحقيقة تحققت مع اختراع الفيديو.
يقول باتشين بارس في كتابه " المحرك الإيروتيكي" إن جهاز الفيديو ولد ككيان اقتصادي وتقني مستقل.
في البداية لم يكن بيع أجهزة الفيديو سهلا، فقد كانت مكلفة، كما كانت تعتمد نظامين مختلفين تماما.
من سيستثمر مبلغا باهظا في جهاز قد يعفو عليه الزمن في فترة وجيزة ؟ الأشخاص الذين يرغبون بمشاهدة الأفلام الإباحية.
مصدر الصورة
Getty Images
في نهاية سبعينيات القرن الماضي كانت معظم مبيعات أشرطة الفيديو لأفلام إباحية.
خلال سنوات قليلة انخفضت تكاليف التكنولوجيا، وأصبحت تناسب ميزانيات من يريدون مشاهدة أفلاما في بيتهم، ومع توسع السوق أصبح نصيب صناعة الأفلام الإباحية فيه اقل.
ويشبه ذلك ما حدث مع الإنترنت.
مستخدمو شبكة الإنترنت في بداياتها لابد يذكرون كيف كان لك يتم عبر الاتصال الهاتفي، والانتظار فترة طويلة لتنزيل ملف لا يستغرق تنزيله حاليا سوى ثوان معدودات.
ما الذي يمكن أن يكون حافزا قويا وراء استخدام الإنترنت؟
يتضح من دراسة أجريت في تسعينيات القرن الماضي أن خمسة من كل ستة صور جرت مشاركتها كانت صورا إباحية.
بعد سنوات قليلة اتضح أن نفس الوضع قائم فيما يتعلق بغرف الدردشة.
إذن في تلك الأيام لم يكن تحليل "تريكي مونستر" بعيدا عن الواقع، وكما يشرح لكيت فإن الأفلام الإباحية ساعدت في تطوير الطلب على الانترنت السريعة.
كان مزودو المحتويات الإباحية روادا في تطور تقنيات الإنترنت، مثل تكثيف الملفات وتطوير وسائل دفع تلائم المستخدم.
تطورت هذه الأفكار بحثا عن جمهور واسع من المستخدمين، ومع توسع مجال الإنترنت اصبح استخدامها متعدد الوجدا وضاق حيز المواد الإباحية فيها.
كما هو صعب بيع اشتراك في صحيفة أو فيديو موسيقي في وقت يمكن الحصول على كميات هائلة من كل هذا على الإنترنت فقد أصبح من الصعب بيع المواد الإباحية مع توفر الكثير من المواقع مجانا.
جزء كبير من المواد الإباحية التي تعرض مجانا مسروق، وليس سهلا إزالة المواد المسروقة من الشبكة العنكبوتية.
أحد التوجهات الجديدة كان إنتاج مواد إباحية حسب الطلب، مثل الرجل الذي دفع للمثلة الإباحية كيسي كافيرت وآخرين من أجل أن يتلفوا مجموعة الطوابع البريدية التي تخصه أمام الكاميرا.
لكن طبعا ما يجده المبدعون سيئا يعجب المنصات التي تحصل على دخل عبر تسويق إعلاناتها وبيع الاشتراكات.
وخلقت هيمنة شركة واحدة على سوق الأفلام الإباحية وهي شركة "مايند غيك" التي تملك "بورن هاب"مشكلة، وفقا للبروفيسورة مارينا أدشيد، من كلية الإقتصاد في مدينة فانكوفر، ومؤلفة كتاب"دالاس والجنس: كيف يؤثر الاقتصاد على الجنس والحب".
تقول أدشيد إن " وجود مشتر وحيد يضع ضغطا على المنتجين لتخفيض أسعار افلامهم".
وأضافت "هذا لم يؤد إلى تخفيض الأرباح فقط، بل غير طبيعة عمل ممثلي الأفلام الإباحية، ووضع عليهم ضغوطا لأداء مشاهد كان بإمكانهم رفضها في الماضي، بأجور أقل مما اعتادوا عليه".
في "أفينيو كيو"، تريكي مونستر يبدو كأنه لا يفعل شيئا طوال اليوم سوى البحث على الإنترنت عن أفلام إباحية. وتفسيره لذلك هو أن "السوق متقلب، لذا الاستثمار الوحيد المستقر هو الأفلام الإباحية".
ومرة أخرى، تريكي مونستر على حق، لكن ليس تماما.
من المؤكد أن قطاع الأفلام الإباحية يجلب المال، لكن أفضل طريقة لتحقيق الأرباح قد تكون الاستثمار في التكنولوجيا التي تجعل تحقيقها ممكنا.
في الماضي كان هذا يعني ستوديوهات التصوير الباريسية أو الشركات التي تصنع أجهزة الفيديو أو الموديم السريع. أما في هذه الايام فالمفتاح هو خوارزميات مايندغيكس التي تقترح المحتوى المطلوب وتجعل العيون مسمرة على الشاشات.
وماذا سيغني تريكي مونستر في المستقبل ؟ ربما "إنسان آلي للأفلام الإباحية" ؟
لا يبدو أن دور الجنس في تسريع إيقاع تطور التكنولوجيا سيتغير.
في هذه الأثناء، جارها تريكي مونستر يصر على أن الناس يرون قيمة أكبر لها في النشاطات الحميمية.
هل هو محق ؟ إلى حد ما .
يحاول برنامج "50 شيئا شكلت الاقتصاد الحديث" التركيز على الاختراعات والأفكار التي ساعدت على خلق عالم الاقتصاد.
وتشير إحصائيات تبدو موثوقة إلى أن واحدا من سبع حالات بحث على الإنترنت هي عن مواد إباحية. هذه المعلومة ليست عديمة الأهمية، لكنها أيضا تعني أن ست حالات بحث مرتبطة بأشياء اخرى.
الموقع الإباحي الأكثر زيارة (بورن هاب) هو تقريبا بنفس شعبية مواقع مثل "نيت فليكس" و "لينكد إن". هذا يعني أنه في موقع متقدم، لكنه رقم 28 في الحقيقة .
لكن مسرحية "افينيو كيو" عرضت للمرة الأولى عام 2003 وقد يكون تريكي مونستر محقا في ذلك الوقت.
التكنولوجيا الحديثة تكون باهظة التكاليف، لذلك هناك حاجة لإيجاد سوق متخصص يساعدها على التطور.
وحين تصبح أرخص وموثوقة أكثر فإنها تصل إلى سوق أوسع ومجال واسع من الاستخدامات.
وهناك فرضية ترى ان الافلام الإباحية ساهمت في تطور الإنترنت ومجموعة كبيرة من فروع التكنولوجيا.
منذ بدايات الفن كان الجنس أحد مواضيعه. وجدت صور أرداف وأثداء وفروج وأعضاء ذكرية كبيرة بشكل مضحك في اللوحات المرسومة على جدران الكهوف.
وهناك صور لعمليات جماع منحوتة تعود إلى 11 ألف سنة على الأقل.
وقد نحت فنان من بلاد ما بين النهرين تمثالا طينيا لامرأة ورجل يمارسان الجنس بينما المرأة تحتسي الجعة قبل 4000 سنة تقريبا.
بمرور ألفي سنة أخرى صور فنانون من شعب الموتشي في بيرو عملية الجماع على قطع الخزف.
أما نصوص "كاما سوترا" الإيروتيكية فتعود إلى نفس المرحلة الزمنية.
لكن استخدام الفنون لتصوير أوضاع إيروتيكية لا يعتي أنها كانت وراء تطورها.
إذا فكرنا في تطور الطباعة مثلا، فإن الاقتصاد كان وراءها، على الرغم من طباعة نصوص إيروتيكية.
التصوير هو فن آخر يعود إلى القرن التاسع عشر وينافس في مصداقيته الأمثلة السابقة.
ضمن الاستوديوهات الرائدة في باريس ازدهرت ما تسمى باستوديوهات الفن.
كان الزبائن مستعدين للدفع بسخاء لتمويل التقنيات الجديدة. في مرحلة ما كان الحصول على صورة امرأة عارية يكلف أكثر من أجر بائعة هوى.
كلمة "بورنوغرافي" التي تشير إلى الإباحية مشتقة من التعبير اليوناني الذي يعني "الكتابة" و"المومس".
لكن الإباحية لم تكن وراء تطور السينما، لأسباب واضحة.
كانت الأفلام باهظة التكاليف، وكانت هناك حاجة لجمهور كبير من المشاهدين لتغطيتها.
ومع أن هناك أشخاصا مستعدون لدفع مبالغ مقابل مشاهدة صور إباحية في بيوتهم، فإن مشاهدة الأفلام وسط جمهور أمر محرج.
جاء أحد الحلول في ستينيات القرن الماضي: جهاز في مكان مغلق تضع فيه نقودا فيعرض الأفلام.
وكان بإمكان مقصورة واحدة أن تدر آلاف الدولارات أسبوعيا، لكن الخصوصية الحقيقة تحققت مع اختراع الفيديو.
يقول باتشين بارس في كتابه " المحرك الإيروتيكي" إن جهاز الفيديو ولد ككيان اقتصادي وتقني مستقل.
في البداية لم يكن بيع أجهزة الفيديو سهلا، فقد كانت مكلفة، كما كانت تعتمد نظامين مختلفين تماما.
من سيستثمر مبلغا باهظا في جهاز قد يعفو عليه الزمن في فترة وجيزة ؟ الأشخاص الذين يرغبون بمشاهدة الأفلام الإباحية.
خلال سنوات قليلة انخفضت تكاليف التكنولوجيا، وأصبحت تناسب ميزانيات من يريدون مشاهدة أفلاما في بيتهم، ومع توسع السوق أصبح نصيب صناعة الأفلام الإباحية فيه اقل.
ويشبه ذلك ما حدث مع الإنترنت.
مستخدمو شبكة الإنترنت في بداياتها لابد يذكرون كيف كان لك يتم عبر الاتصال الهاتفي، والانتظار فترة طويلة لتنزيل ملف لا يستغرق تنزيله حاليا سوى ثوان معدودات.
ما الذي يمكن أن يكون حافزا قويا وراء استخدام الإنترنت؟
يتضح من دراسة أجريت في تسعينيات القرن الماضي أن خمسة من كل ستة صور جرت مشاركتها كانت صورا إباحية.
بعد سنوات قليلة اتضح أن نفس الوضع قائم فيما يتعلق بغرف الدردشة.
إذن في تلك الأيام لم يكن تحليل "تريكي مونستر" بعيدا عن الواقع، وكما يشرح لكيت فإن الأفلام الإباحية ساعدت في تطوير الطلب على الانترنت السريعة.
كان مزودو المحتويات الإباحية روادا في تطور تقنيات الإنترنت، مثل تكثيف الملفات وتطوير وسائل دفع تلائم المستخدم.
تطورت هذه الأفكار بحثا عن جمهور واسع من المستخدمين، ومع توسع مجال الإنترنت اصبح استخدامها متعدد الوجدا وضاق حيز المواد الإباحية فيها.
كما هو صعب بيع اشتراك في صحيفة أو فيديو موسيقي في وقت يمكن الحصول على كميات هائلة من كل هذا على الإنترنت فقد أصبح من الصعب بيع المواد الإباحية مع توفر الكثير من المواقع مجانا.
جزء كبير من المواد الإباحية التي تعرض مجانا مسروق، وليس سهلا إزالة المواد المسروقة من الشبكة العنكبوتية.
أحد التوجهات الجديدة كان إنتاج مواد إباحية حسب الطلب، مثل الرجل الذي دفع للمثلة الإباحية كيسي كافيرت وآخرين من أجل أن يتلفوا مجموعة الطوابع البريدية التي تخصه أمام الكاميرا.
لكن طبعا ما يجده المبدعون سيئا يعجب المنصات التي تحصل على دخل عبر تسويق إعلاناتها وبيع الاشتراكات.
وخلقت هيمنة شركة واحدة على سوق الأفلام الإباحية وهي شركة "مايند غيك" التي تملك "بورن هاب"مشكلة، وفقا للبروفيسورة مارينا أدشيد، من كلية الإقتصاد في مدينة فانكوفر، ومؤلفة كتاب"دالاس والجنس: كيف يؤثر الاقتصاد على الجنس والحب".
تقول أدشيد إن " وجود مشتر وحيد يضع ضغطا على المنتجين لتخفيض أسعار افلامهم".
وأضافت "هذا لم يؤد إلى تخفيض الأرباح فقط، بل غير طبيعة عمل ممثلي الأفلام الإباحية، ووضع عليهم ضغوطا لأداء مشاهد كان بإمكانهم رفضها في الماضي، بأجور أقل مما اعتادوا عليه".
في "أفينيو كيو"، تريكي مونستر يبدو كأنه لا يفعل شيئا طوال اليوم سوى البحث على الإنترنت عن أفلام إباحية. وتفسيره لذلك هو أن "السوق متقلب، لذا الاستثمار الوحيد المستقر هو الأفلام الإباحية".
ومرة أخرى، تريكي مونستر على حق، لكن ليس تماما.
من المؤكد أن قطاع الأفلام الإباحية يجلب المال، لكن أفضل طريقة لتحقيق الأرباح قد تكون الاستثمار في التكنولوجيا التي تجعل تحقيقها ممكنا.
في الماضي كان هذا يعني ستوديوهات التصوير الباريسية أو الشركات التي تصنع أجهزة الفيديو أو الموديم السريع. أما في هذه الايام فالمفتاح هو خوارزميات مايندغيكس التي تقترح المحتوى المطلوب وتجعل العيون مسمرة على الشاشات.
وماذا سيغني تريكي مونستر في المستقبل ؟ ربما "إنسان آلي للأفلام الإباحية" ؟
لا يبدو أن دور الجنس في تسريع إيقاع تطور التكنولوجيا سيتغير.
Monday, May 20, 2019
فيسبوك تحظر شركة إسرائيلية تستهدف الانتخابات في دول أفريقية بينها تونس
حذفت شركة فيسبوك مئات من حسابات التواصل الاجتماعي، كما حظرت شركة إسرائيلية جرّاء "سلوك زائف منسَّق" يستهدف أفريقيا بالأساس.
وقالت فيسبوك إن تلك الحسابات الزائفة دأبت على نشر أخبار سياسية، منها ما يتعلق بالانتخابات في دول مختلفة.وواجهت فيسبوك انتقادات متزايدة لإخفاقها في إزالة معلومات مضللة من منصتها.
وكانت الشركة دشنت برنامجا للتدقيق في حقيقة المنشورات عام 2016 بعد وقت قصير من انتخاب دونالد ترامب رئيسا للولايات المتحدة.
وفي تدوينة، قالت فيسبوك إنها كانت أزالت 265 من حسابات تواصلٍ اجتماعي أنشئت في إسرائيل وركزت على كل من نيجيريا والسنغال وتوغو وأنغولا والنيجر وتونس، فضلا عن "بعض أنشطة" في أمريكا اللاتينية وجنوب شرق آسيا.
وفي التدوينة كتب ناثانيال غليتشر، المسؤول عن سياسة الأمن الإلكتروني في فيسبوك، قائلا إن أصحاب تلك الحسابات الزائفة "قدّموا أنفسهم على أنهم جهات محلية، بينها مؤسسات أخبار محلية، ونشروا معلومات زعموا أنها مسرّبة عن سياسيين. وقد توصلت تحقيقات إلى أن بعضا من تلك الأنشطة ارتبط بمجموعة شركات أرخميدس الإسرائيلية".
وأضاف غليتشر: "الآن حظرت فيسبوك هذه الشركة وفروعها، وكانت قد أرسلت إليها إشعارا بإيقاف نشاطها".
وكشفت فيسبوك عن أن القائمين على تلك الحسابات الوهمية أنفقوا نحو 812 ألف دولار على الإعلانات في الفترة من ديسمبر/كانون الأول 2012 وأبريل/نيسان 2019، وأشارت فيسبوك إلى أن هذه الأموال كانت بالريال البرازيلي والشيكل الإسرائيلي، والدولار الأمريكي.
وأجرت خمس من الدول الست الأفريقية التي كانت تستهدفها هذه الحسابات الزائفة انتخابات منذ 2016، وستشهد تونس انتخابات تشريعية ورئاسية في وقت لاحق من العام الجاري.
وتواجه فيسبوك انتقادات متزايدة لإخفاقها في استئصال المعلومات المضللة التي يمكن أن تؤثر على مجريات التصويت في الانتخابات.
فاز المغني الهولندي دانكن لورانس بمسابقة الأغنية الأوروبية يوروفيجن لعام 2019 التي جرت فعالياتها في تل أبيب في إسرائيل.
وحصدت هولندا 492 نقطة لتحل في المركز الأول بأغنية "اركاد".وقال لورانس "هذا هو الحلم الكبير، الموسيقى تأتي أولاً ودائماً".
وكانت هولندا فازت آخر مرة بمسابقة يوروفيجن في عام 1975، واحتفى الجمهور بلورانس نهاية الحفل وشاركوه بغناء أغنيته الفائزة.
واحتلت إيطاليا المركز الثاني برصيد 465 نقطة، فيما احتلت روسيا المركز الثالث بـ 369 نقطة.
وجاءت بريطانيا في المرتبة الأخيرة بعد حصولها على 3 نقاط من الجمهور بإجمالي 16 نقطة.
وشاركت المطربة مادونا في إحياء الحفل بتقديم مجموعة من أغانيها قبيل إعلان النتائج.
وقال المنظمون إن "ثمة فقرة في اللوحات الاستعراضية لمادونا لم يخطط لها مسبقا".
وقالت يوروفيجن إنه "خلال البث المباشر للحفل النهائي لمسابقة يوروفيجن ظهر اثنان من الراقصين وقد طبعت أعلام إسرائيلية وفلسطينية على ثيابهما".
وأضافت "لم يكن ذلك جزءاً من التدريبات، ومسابقة الأغنية الأوروبية ليست حدثاً سياسياً، وقد تم إعلام مادونا بالأمر".
وقال المنظمون إن أيسلندا قد تواجه عقوبة بعد رفعها الأعلام الفلسطينية خلال البث المباشر للحفل.
وأضافوا أنه خلال الحفل النهائي، رفع أعضاء من الفرقة الأيسلندية الأعلام الفلسطينية خلال الإعلان عن نتائج تصويت الجمهور لهم.
وفي في بيان ، قالت يوروفيجن إن "عواقب هذا الإجراء" سيبحثها المجلس التنفيذي للمسابقة.
Monday, May 13, 2019
شيماء سيف تثير القضية: كيف تصور الدراما العربية السودانيين؟
قبل أيام، أثار برنامج المقالب "الشقلباظ" الذي يعرض على إحدى القنوات المصرية، حفيظة السوادنيين والمصريين على حد سواء.
فقد أطلت الممثلة المصرية شيماء سيف في إحدى حلقات البرنامج وقد صبغت وجهها بالأسود لتتقمص دور امرأة سمراء بطريقة اعتبرها كثيرون "مسيئة للمرأة السودانية والنوبية".
وأظهر الفيديو المتداول عبر هاشتاغ #_تحرش_جنسي_بفتاه_الدمام فتاة داخل بقالة عندما قام أحد المتسوقين بالاقتراب منها ولمسها بينما بدت الصدمة واضحة عليها.
ولم تعقب الجهات الرسمية على الحادثة، إلا مغردين طالبوها بالقبض على الرجل وتسليط أقسى العقوبات عليه.
وقد قاد تدخل الشرطة أمس الجمعة للقبض على شاب تحرش بفتيات داخل سيارة في محافظة الخبر بعدما سجلت إحداهن الحادثة بواسطة هاتفها الجوال.
ويفرض القانون عقوبة تصل إلى السجن حتى خمسة أعوام وغرامة تصل إلى 300 ألف ريال (80 ألف دولار) أو إحدى العقوبتين، على كل المتحرش.
وقد بدأ العمل بالقانون منذ الـ8 من يونيو/ حزيران 2018.
وأشارت صحيفة عكاظ السعودية إلى تراجع قضايا التحرش خلال العام الحالي مقارنة بالعام الماضي. فقد سجلت المحاكم السعودية 579 قضية تحرش خلال العام الحالي، بينما تجاوز عدد قضايا التحرش خلال الفترة نفسها من العام الماضي 700 قضية.
لكن قطاعا واسعا من المغردين أسهب في تحليل الأسباب الكامنة وراء انتشار ظاهرة التحرش في الأونة الأخيرة رغم تفعيل القانون.
فمن المغردين من ربط ازدياد حالات التحرش بـ "خطط الانفتاح" التي شهدتها السعودية وأدت إلى تقليص صلاحيات هيئة الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر.
فعلق المغرد سليمان الفايز:" قانون التحرش في السعودية من أقوى القوانين الرادعة ، ولكن من يتحرش أصلا هو المغييب عقليا ...#هيئة_الأمر_بالمعروف كانت بمثابة بوليس آداب ومجرد تواجدها كان بمثابة الرادع .. قضايا التحرش أصبحت ظاهرة تزداد ولابد من مواجهتها ."
أما عبد الله الشمري فكتب:" ماقام به يدل على وجود انحراف فكري لدى بعض الشباب الذين تلوثت أفكارهم وماحدث هو بسبب تعطيل عمل الهيئة التي كانت تردع هولاء الساقطين #_تحرش_جنسي_بفتاه_الدمام."
في المقابل، ذكّر مغردون بحوادث مماثلة وقعت أثناء عمل هيئة الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر، رافضين ربط الظاهرة بغيابها أو برؤية 2030.
وعزا بعضهم تكرر حوادث التحرش إلى مجموعة من العوامل الثقافية والاجتماعية، كـ "النظرة التقليدية في المجتمع التي تفضل الرجل وتجد له المبرارت فتتحول المرأة من ضحية إلى مذنبة".
في هذا السياق، تقول مضاوي عسيري :"هناك فكر متشدد يحمل المرأة كل المشاكل بسبب ملابسها بل حتى لمجرد خروجها من منزلها كما هو الحال في الحادثتين الأخيرتين، فسيدة الدمام كانت ترتدي نقابا."
وعلى نفس المنوال، غرد "علي" قائلا " فندت فتاة الدمام النظرية السطحية المتمثلة في تحمل المرأة المسؤولية الكاملة في حال تعرضها للتحرش. فلاالعباءة ولا القانون يكفيان للتصدي لظاهرة التحرش."
في حين تحدثت "أم فهد" عن العراقيل التي من شأنها أن تعطل تطبيق قانون مكافحة التحرش. فكتبت:" للأسف توجد قضيتان في السعودية لم تحلا. الأولى الواسطات: أبوه فلان عزيز وغالي ومن قبيلة أو عائلة تريد الستر والثانية توجد قوانين لكنها تطبق حسب المزاج ."
من جهة أخرى، هناك من حمل الكبت وغياب الثقافة الجنسية المسؤولية، إلا أن مغردين استدلوا بشواهد من المجتمعات أوروبية تدحض هذا التفسير.
لذا طالب عدد من المختصين الاجتماعيين على تويتر بتطوير قانون مكافحة التحرش، وتخصيص حصص دراسية لتوعية النشء بمخاطره.
ويقول هؤلاء إن التغيير لا يجب أن يتخذ أشكالا سطحية، بل يجب أن يكون مصحوبا بتطور في منظومة تفكير المجتمع، فمحاولات التغيير السريعة ربما تأتي بنتائج عكسية، حسب رأيهم.
فقد أطلت الممثلة المصرية شيماء سيف في إحدى حلقات البرنامج وقد صبغت وجهها بالأسود لتتقمص دور امرأة سمراء بطريقة اعتبرها كثيرون "مسيئة للمرأة السودانية والنوبية".
وأظهر الفيديو المتداول عبر هاشتاغ #_تحرش_جنسي_بفتاه_الدمام فتاة داخل بقالة عندما قام أحد المتسوقين بالاقتراب منها ولمسها بينما بدت الصدمة واضحة عليها.
ولم تعقب الجهات الرسمية على الحادثة، إلا مغردين طالبوها بالقبض على الرجل وتسليط أقسى العقوبات عليه.
وقد قاد تدخل الشرطة أمس الجمعة للقبض على شاب تحرش بفتيات داخل سيارة في محافظة الخبر بعدما سجلت إحداهن الحادثة بواسطة هاتفها الجوال.
ويفرض القانون عقوبة تصل إلى السجن حتى خمسة أعوام وغرامة تصل إلى 300 ألف ريال (80 ألف دولار) أو إحدى العقوبتين، على كل المتحرش.
وقد بدأ العمل بالقانون منذ الـ8 من يونيو/ حزيران 2018.
وأشارت صحيفة عكاظ السعودية إلى تراجع قضايا التحرش خلال العام الحالي مقارنة بالعام الماضي. فقد سجلت المحاكم السعودية 579 قضية تحرش خلال العام الحالي، بينما تجاوز عدد قضايا التحرش خلال الفترة نفسها من العام الماضي 700 قضية.
لكن قطاعا واسعا من المغردين أسهب في تحليل الأسباب الكامنة وراء انتشار ظاهرة التحرش في الأونة الأخيرة رغم تفعيل القانون.
فمن المغردين من ربط ازدياد حالات التحرش بـ "خطط الانفتاح" التي شهدتها السعودية وأدت إلى تقليص صلاحيات هيئة الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر.
فعلق المغرد سليمان الفايز:" قانون التحرش في السعودية من أقوى القوانين الرادعة ، ولكن من يتحرش أصلا هو المغييب عقليا ...#هيئة_الأمر_بالمعروف كانت بمثابة بوليس آداب ومجرد تواجدها كان بمثابة الرادع .. قضايا التحرش أصبحت ظاهرة تزداد ولابد من مواجهتها ."
أما عبد الله الشمري فكتب:" ماقام به يدل على وجود انحراف فكري لدى بعض الشباب الذين تلوثت أفكارهم وماحدث هو بسبب تعطيل عمل الهيئة التي كانت تردع هولاء الساقطين #_تحرش_جنسي_بفتاه_الدمام."
في المقابل، ذكّر مغردون بحوادث مماثلة وقعت أثناء عمل هيئة الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر، رافضين ربط الظاهرة بغيابها أو برؤية 2030.
وعزا بعضهم تكرر حوادث التحرش إلى مجموعة من العوامل الثقافية والاجتماعية، كـ "النظرة التقليدية في المجتمع التي تفضل الرجل وتجد له المبرارت فتتحول المرأة من ضحية إلى مذنبة".
في هذا السياق، تقول مضاوي عسيري :"هناك فكر متشدد يحمل المرأة كل المشاكل بسبب ملابسها بل حتى لمجرد خروجها من منزلها كما هو الحال في الحادثتين الأخيرتين، فسيدة الدمام كانت ترتدي نقابا."
وعلى نفس المنوال، غرد "علي" قائلا " فندت فتاة الدمام النظرية السطحية المتمثلة في تحمل المرأة المسؤولية الكاملة في حال تعرضها للتحرش. فلاالعباءة ولا القانون يكفيان للتصدي لظاهرة التحرش."
في حين تحدثت "أم فهد" عن العراقيل التي من شأنها أن تعطل تطبيق قانون مكافحة التحرش. فكتبت:" للأسف توجد قضيتان في السعودية لم تحلا. الأولى الواسطات: أبوه فلان عزيز وغالي ومن قبيلة أو عائلة تريد الستر والثانية توجد قوانين لكنها تطبق حسب المزاج ."
من جهة أخرى، هناك من حمل الكبت وغياب الثقافة الجنسية المسؤولية، إلا أن مغردين استدلوا بشواهد من المجتمعات أوروبية تدحض هذا التفسير.
لذا طالب عدد من المختصين الاجتماعيين على تويتر بتطوير قانون مكافحة التحرش، وتخصيص حصص دراسية لتوعية النشء بمخاطره.
ويقول هؤلاء إن التغيير لا يجب أن يتخذ أشكالا سطحية، بل يجب أن يكون مصحوبا بتطور في منظومة تفكير المجتمع، فمحاولات التغيير السريعة ربما تأتي بنتائج عكسية، حسب رأيهم.
ربيكا غرايمس: "التقطت هذه الصورة (لشلالات نياغرا) أثناء رحلة بالقارب، أثناء مرور قوس قزح في
السماء، وكان يمكنني سماع هدير الماء".
سالي بوين: "سكوغافوسن الواقعة على نهر سكوغا في أيسلاند، جميلة أثناء النهار وخلابة ليلا، خاصة عندما تتلألأ أضواء الشمال".
ليوناردو فوغوسو: "أطفال
يستكشفون ضفة نهر تشيبوا في أو كلير بولاية ويسكنسون بعد أن غمرتها مياه الفيضان. يفيض النهر كل ربيع بعد ذوبان الثلوج".
هادي زيتاوي: "لمحت حركة في
مياه النهر الموحلة ورأيت ثعبانا نهريا صغيرا يحاول ابتلاع سمكة كاملة. كان أمرا رائعا أن أشاهد جزء من دائرة الحياة".
آدم تيلور: "منطقة المياه في ألابزوها تربط بين عدد من الأنهار في كيرالا في الهند. تقدم هذه المنطقة
المأوى والمعيشة لملايين الأشخاص المقيمين في هذه المنطقة. اعتقد أن هذه
الصورة توضح جزءا صغيرا من هذه الحياة".
Tuesday, April 23, 2019
يرغب المحتجون في اقتلاع جميع النخبة الحاكمة
التايمز نشرت مقالا لمحرر شؤون الشرق الاوسط ريتشارد سبنسر معلقا على
العقوبات الأمريكية على إيران بعنوان "منع ترامب صادرات النفط الإيرانية قد
تؤدي لانتقام أسيوي".
يقول سبنسر إن قرار الرئيس الأمريكي دونالد ترامب إنهاء الاستثناءات التي كانت بلاده قد وافقت عليها لبعض الدول لشراء النفط الإيراني تهدد برد فعل انتقامي وحروب اقتصادية مع الدول الصاعدة في آسيا مثل الصين والهند وهما تعتمدان بشكل كبير على النفط الإيراني القريب وزهيد الثمن.
ويوضح سبنسر أن واشنطن منحت الاستثناء العام الماضي لعدة دول منها الهند والصين وتركيا وكوريا الجنوبية واليابان وإيطاليا واليونان وتايوان وخلال هذا العام قلصت الدول الثلاث الأخيرة وارداتها النفطية من إيران بينما تشتري الدول الخمس الباقية ملايين البراميل من النفط يوميا من إيران.
ويشير سبنسر إلى أن القرار "سيضع المزيد من الصعوبات الاقتصادية على كاهل إيران التي كانت تصدر خلال العام المنصرم مليوني برميل من النفط يوميا منها نحو 650 ألف برميل للصين، و500 ألف برميل للهند، و300 ألف برميل لكوريا الجنوبية، و165 ألف برميل لتركيا وهو الأمر الذي يبرر الغضب الصيني من فرض عقوبات أمريكية على صادرات النفط الإيراني حتى مع السماح لها بشرائه من خلال الاستثناء الأمريكي فكيف سيكون موقفها اليوم؟"
ويعرج سبنسر على الموقف التركي بعدما تذرعت أنقرة بأن لها موقفا خاصا بسبب اعتمادها بشكل كبير على النفط الإيراني في توفير إمدادات الطاقة لمواطنيها وجوارها لإيران لكن الجانب الأمريكي لم يقبل هذا الطرح.
ونشرت الديلي تليغراف مقالا للصحفية كاميلا تومني بعنوان "الجهاديون شوهونا والحكومة أهملتنا" تتناول فيه المعاناة التي يمر بها ضحايا العمليات المسلحة في بريطانيا والذين فقدوا بعض أطرافهم أو تعرضوا لإصابات وتشويه.
وتقول تومني إن هؤلاء الضحايا يتعرضون لإهمال صادم من جانب الحكومة البريطانية والتي لم تول لهم الاهتمام الكافي سواء على الجانب النفسي أو العقلي لدرجة ان بعضهم حاول الانتحار بسبب يأسهم من الحصول على دعم الحكومة.
وتشير تومني إلى أن ضحايا هجوم ويستمينستر و مانشستر دعوا إلى مراجعة من لجنة مستقلة لموقفهم مؤكدين انهم بعد خروجهم من المستشفى "تركوا ليعانوا وحدهم" مضيفة أن جمعية (الناجون من الإرهاب) التي يقودها زوج النائبة الراحلة في مجلس العموم جو كوكس، بدأت بالفعل جمع التبرعات من اجل عمل اللجنة المستقلة التي يطالبون بها.
علّقت صحف عربية بنسختيها الورقية والإلكترونية على الوضع الراهن في الجزائر في ظل المشاورات التي يجريها الرئيس المؤقت عبد القادر بن صالح مع الأطراف السياسية تحضيرا للانتخابات الرئاسية المزمع عقدها في الرابع من يوليو/تموز المقبل.
ويحذر كُتّاب من ضياع الوقت في مشاورات وصفها بأنها "صورية" قد تهدد باستنفاد الآجال المحددة دستوريا للمرحلة الانتقالية، فيما قال آخرون إن الجزائر بحاجة إلى الانتقال إلى "الجمهورية الثانية".
وتحت عنوان "رهان الفراغ.. ليس من فراغ"، يقول عمار يزلي في "الشروق" الجزائرية إن "الرهانات الوطنية الآن بدأت تتضح معالمها، رغم الغموض والتداخل والاشتباه الحاصل وهذا بعد تسع جمعات من الحراك الأسبوعي، الذي تطور ليصبح حراكا مطلبيا شبه يومي".
ويقول الكاتب إن موقف المؤسسة العسكرية "بدا واضحا أكثر فأكثر: موقف مصطف مبدئيا وبلا مواربة مع الإرادة الشعبية في التغيير".
ويرى أن "الرهان الأكبر اليوم هو رهان كسب ثقة الشعب وتفهم الحراك لهذه الرغبة الأكيدة لمؤسسة الجيش التي تريد أن تبقى ضمن نطاق الدستور في أي تعامل مع الأحداث، محاولة منها تجنب فراغ دستوري تريده الأقلية الساحقة باسم الأغلبية المسحوقة راكبة موجة الحراك".
ويتساءل: "هل علينا الآن أن نواصل العمل من أجل انتخاب رئيس جمهورية في الآجال الدستورية؟ ... أم سنمضي في استنفاد المسار الدستوري إلى غاية الخروج بحل توافقي حول شخصية وطنية تقود مرحلة انتقالية قصيرة؟ ونكون قد دخلنا في فراغ دستوري أجبره الانصياع للدستور؟ وهذا ما أتصور أنه قد يحدث إذا لم يحدث حادث آخر قد يفرز مخرجات جديدة لوضع لا يقبل الإطالة ومرض لا يقبل تمديده؟"
وفي السياق ذاته، يقول سليم قلالة في الصحيفة نفسها: "يبدو أن المسار التشاوري الذي بدأته رئاسة الدولة في اليومين الأخيرين لا ينبِّئ بأننا سنصل يوم 4 جويلية [يوليو/تموز] القادم إلى انتخاب رئيسٍ للجمهورية يحظى بثقة غالبية الشعب".
ويقول الكاتب: "إذا ما أضعنا هذه الأسابيع في مشاورات صورية لن نتمكن من إيجاد الآليات اللازمة للقيام بانتخابات رئاسية ذات مصداقية في الوقت المُحدَّد، وإذا لم نتمكَّن من تحقيق هذه الغاية في آجالها المحددة دستوريا أو تم تحقيقها بغير رضا الشعب، سنَدخُل في وضع أخطر من الوضع الذي سبق استقالة رئيس الجمهورية المنتهية عهدته".
ويضيف محذرا: "حينها سنكون أمام سيناريو أكثر خطورة يتمثل في وجود رئيس 'منتخَب' لا يحظى برضا الشعب، وعندها سيأخذ الحراكُ طابعا آخر ويدخل ضمن آجال مفتوحة، والأخطر أنه سيُعَدُّ غير مشروع في نظر الرئيس الجديد بما سيترتب عن ذلك من أزمات على أكثر من صعيد، ستتحول إلى نزاعات تناحرية بمرور الأيام بكل ما يعني ذلك من نتائج وخيمة".
وتحت عنوان "حاجة الجزائر إلى الجمهورية الثانية"، يقول خير الله خير الله في صحيفة "العرب" اللندنية: "ستحدد الأشهر المقبلة ما إذا كانت الجزائر ستنتقل إلى الجمهورية الثانية، أي إلى ما يطمح إليه الشباب الجزائري. تعني الجمهورية الثانية، قبل أي شيء آخر، التخلص من العقد التي ارتبطت بالجمهورية الأولى".
ويضيف أن قائد أركان الجيش أحمد قايد صالح "هو رجل المرحلة المقبلة في الجزائر"، ويتساءل: "هل يمهّد للجمهورية الثانية عبر استيعاب المطالب الشعبية؟ أم يكون مجرّد ضابط آخر وضع نفسه في خدمة الجمهورية الأولى وإعادة تكوين 'السلطة'؟".
ويؤكد الكاتب أن الجزائر تحتاج إلى "الجمهورية الثانية. لا يمكن للمؤسسة العسكرية السير مجددا في اتجاه استعادة الجمهورية الأولى عن طريق شخص شبيه ببوتفليقة".
وفي شأن آخر، يقول عبد الباري عطوان رئيس تحرير صحيفة "رأي اليوم" الإلكترونية اللندنية إن الأمين العام لحزب الله اللبناني حسن نصر الله "يتوقع حربا مع إسرائيل هذا الصيف ويعلن حالة التأهب ويتوقع استشهاده".
ويقول الكاتب إنه زار لبنان قبل أسبوعين والتقى عديدا من السياسيين والمحللين والمسؤولين وبعد هذا "كان الانطباع الأقوى الذي خرجت به، أن المنطقة باتت على حافة الحرب، وأن الاحتقان بلغ ذروته وبات بانتظار عود الثقاب أو المتفجر".
ويضيف أنه توقع في مقال سابق أن يكون "الثالث من أيار (مايو) المقبل كأحد المواعيد المرشحة لساعة الصفر لهذه الحرب، وبنيت توقعاتي هذه على أن هذا التاريخ سيشهد تطبيق المرحلة الثانية من العقوبات الأمريكية المفروضة على إيران، ومنعها من تصدير أي برميل نفط، واحتمال تنفيذ نتنياهو لتهديداته بقصف ناقلات النفط الإيرانية في الخليج والمحيط الهندي".
كما يشير عطوان إلى قرار المرشد الأعلى للثورة الإيرانية علي خامنئي بتعيين الجنرال حسين سلامي قائدا جديدا للحرس الثوري خلفا للجنرال محمد علي جعفري، وبعد أيام من تصنيف الولايات المتحدة الحرسَ الثوري الإيراني كحركة إرهابية، قائلا إن هذا القرار "قد يكون في إطار الاستعدادات لهذه الحرب، فهو يُعتبر من جناح 'الصقور' في المؤسسة العسكرية الإيرانية، وهدد بإزالة إسرائيل من الوجود".
ويؤكد الكاتب أن "البنى التحتية للمواجهة في جنوب لبنان اكتملت ومعها قوة الردع الصاروخية الهائلة، فجبال لبنان الشامخة تخفي في جوفها مدناً وقرى ومصانع للصواريخ الدقيقة".
يقول سبنسر إن قرار الرئيس الأمريكي دونالد ترامب إنهاء الاستثناءات التي كانت بلاده قد وافقت عليها لبعض الدول لشراء النفط الإيراني تهدد برد فعل انتقامي وحروب اقتصادية مع الدول الصاعدة في آسيا مثل الصين والهند وهما تعتمدان بشكل كبير على النفط الإيراني القريب وزهيد الثمن.
ويوضح سبنسر أن واشنطن منحت الاستثناء العام الماضي لعدة دول منها الهند والصين وتركيا وكوريا الجنوبية واليابان وإيطاليا واليونان وتايوان وخلال هذا العام قلصت الدول الثلاث الأخيرة وارداتها النفطية من إيران بينما تشتري الدول الخمس الباقية ملايين البراميل من النفط يوميا من إيران.
ويشير سبنسر إلى أن القرار "سيضع المزيد من الصعوبات الاقتصادية على كاهل إيران التي كانت تصدر خلال العام المنصرم مليوني برميل من النفط يوميا منها نحو 650 ألف برميل للصين، و500 ألف برميل للهند، و300 ألف برميل لكوريا الجنوبية، و165 ألف برميل لتركيا وهو الأمر الذي يبرر الغضب الصيني من فرض عقوبات أمريكية على صادرات النفط الإيراني حتى مع السماح لها بشرائه من خلال الاستثناء الأمريكي فكيف سيكون موقفها اليوم؟"
ويعرج سبنسر على الموقف التركي بعدما تذرعت أنقرة بأن لها موقفا خاصا بسبب اعتمادها بشكل كبير على النفط الإيراني في توفير إمدادات الطاقة لمواطنيها وجوارها لإيران لكن الجانب الأمريكي لم يقبل هذا الطرح.
ونشرت الديلي تليغراف مقالا للصحفية كاميلا تومني بعنوان "الجهاديون شوهونا والحكومة أهملتنا" تتناول فيه المعاناة التي يمر بها ضحايا العمليات المسلحة في بريطانيا والذين فقدوا بعض أطرافهم أو تعرضوا لإصابات وتشويه.
وتقول تومني إن هؤلاء الضحايا يتعرضون لإهمال صادم من جانب الحكومة البريطانية والتي لم تول لهم الاهتمام الكافي سواء على الجانب النفسي أو العقلي لدرجة ان بعضهم حاول الانتحار بسبب يأسهم من الحصول على دعم الحكومة.
وتشير تومني إلى أن ضحايا هجوم ويستمينستر و مانشستر دعوا إلى مراجعة من لجنة مستقلة لموقفهم مؤكدين انهم بعد خروجهم من المستشفى "تركوا ليعانوا وحدهم" مضيفة أن جمعية (الناجون من الإرهاب) التي يقودها زوج النائبة الراحلة في مجلس العموم جو كوكس، بدأت بالفعل جمع التبرعات من اجل عمل اللجنة المستقلة التي يطالبون بها.
علّقت صحف عربية بنسختيها الورقية والإلكترونية على الوضع الراهن في الجزائر في ظل المشاورات التي يجريها الرئيس المؤقت عبد القادر بن صالح مع الأطراف السياسية تحضيرا للانتخابات الرئاسية المزمع عقدها في الرابع من يوليو/تموز المقبل.
ويحذر كُتّاب من ضياع الوقت في مشاورات وصفها بأنها "صورية" قد تهدد باستنفاد الآجال المحددة دستوريا للمرحلة الانتقالية، فيما قال آخرون إن الجزائر بحاجة إلى الانتقال إلى "الجمهورية الثانية".
وتحت عنوان "رهان الفراغ.. ليس من فراغ"، يقول عمار يزلي في "الشروق" الجزائرية إن "الرهانات الوطنية الآن بدأت تتضح معالمها، رغم الغموض والتداخل والاشتباه الحاصل وهذا بعد تسع جمعات من الحراك الأسبوعي، الذي تطور ليصبح حراكا مطلبيا شبه يومي".
ويقول الكاتب إن موقف المؤسسة العسكرية "بدا واضحا أكثر فأكثر: موقف مصطف مبدئيا وبلا مواربة مع الإرادة الشعبية في التغيير".
ويرى أن "الرهان الأكبر اليوم هو رهان كسب ثقة الشعب وتفهم الحراك لهذه الرغبة الأكيدة لمؤسسة الجيش التي تريد أن تبقى ضمن نطاق الدستور في أي تعامل مع الأحداث، محاولة منها تجنب فراغ دستوري تريده الأقلية الساحقة باسم الأغلبية المسحوقة راكبة موجة الحراك".
ويتساءل: "هل علينا الآن أن نواصل العمل من أجل انتخاب رئيس جمهورية في الآجال الدستورية؟ ... أم سنمضي في استنفاد المسار الدستوري إلى غاية الخروج بحل توافقي حول شخصية وطنية تقود مرحلة انتقالية قصيرة؟ ونكون قد دخلنا في فراغ دستوري أجبره الانصياع للدستور؟ وهذا ما أتصور أنه قد يحدث إذا لم يحدث حادث آخر قد يفرز مخرجات جديدة لوضع لا يقبل الإطالة ومرض لا يقبل تمديده؟"
وفي السياق ذاته، يقول سليم قلالة في الصحيفة نفسها: "يبدو أن المسار التشاوري الذي بدأته رئاسة الدولة في اليومين الأخيرين لا ينبِّئ بأننا سنصل يوم 4 جويلية [يوليو/تموز] القادم إلى انتخاب رئيسٍ للجمهورية يحظى بثقة غالبية الشعب".
ويقول الكاتب: "إذا ما أضعنا هذه الأسابيع في مشاورات صورية لن نتمكن من إيجاد الآليات اللازمة للقيام بانتخابات رئاسية ذات مصداقية في الوقت المُحدَّد، وإذا لم نتمكَّن من تحقيق هذه الغاية في آجالها المحددة دستوريا أو تم تحقيقها بغير رضا الشعب، سنَدخُل في وضع أخطر من الوضع الذي سبق استقالة رئيس الجمهورية المنتهية عهدته".
ويضيف محذرا: "حينها سنكون أمام سيناريو أكثر خطورة يتمثل في وجود رئيس 'منتخَب' لا يحظى برضا الشعب، وعندها سيأخذ الحراكُ طابعا آخر ويدخل ضمن آجال مفتوحة، والأخطر أنه سيُعَدُّ غير مشروع في نظر الرئيس الجديد بما سيترتب عن ذلك من أزمات على أكثر من صعيد، ستتحول إلى نزاعات تناحرية بمرور الأيام بكل ما يعني ذلك من نتائج وخيمة".
وتحت عنوان "حاجة الجزائر إلى الجمهورية الثانية"، يقول خير الله خير الله في صحيفة "العرب" اللندنية: "ستحدد الأشهر المقبلة ما إذا كانت الجزائر ستنتقل إلى الجمهورية الثانية، أي إلى ما يطمح إليه الشباب الجزائري. تعني الجمهورية الثانية، قبل أي شيء آخر، التخلص من العقد التي ارتبطت بالجمهورية الأولى".
ويضيف أن قائد أركان الجيش أحمد قايد صالح "هو رجل المرحلة المقبلة في الجزائر"، ويتساءل: "هل يمهّد للجمهورية الثانية عبر استيعاب المطالب الشعبية؟ أم يكون مجرّد ضابط آخر وضع نفسه في خدمة الجمهورية الأولى وإعادة تكوين 'السلطة'؟".
ويؤكد الكاتب أن الجزائر تحتاج إلى "الجمهورية الثانية. لا يمكن للمؤسسة العسكرية السير مجددا في اتجاه استعادة الجمهورية الأولى عن طريق شخص شبيه ببوتفليقة".
وفي شأن آخر، يقول عبد الباري عطوان رئيس تحرير صحيفة "رأي اليوم" الإلكترونية اللندنية إن الأمين العام لحزب الله اللبناني حسن نصر الله "يتوقع حربا مع إسرائيل هذا الصيف ويعلن حالة التأهب ويتوقع استشهاده".
ويقول الكاتب إنه زار لبنان قبل أسبوعين والتقى عديدا من السياسيين والمحللين والمسؤولين وبعد هذا "كان الانطباع الأقوى الذي خرجت به، أن المنطقة باتت على حافة الحرب، وأن الاحتقان بلغ ذروته وبات بانتظار عود الثقاب أو المتفجر".
ويضيف أنه توقع في مقال سابق أن يكون "الثالث من أيار (مايو) المقبل كأحد المواعيد المرشحة لساعة الصفر لهذه الحرب، وبنيت توقعاتي هذه على أن هذا التاريخ سيشهد تطبيق المرحلة الثانية من العقوبات الأمريكية المفروضة على إيران، ومنعها من تصدير أي برميل نفط، واحتمال تنفيذ نتنياهو لتهديداته بقصف ناقلات النفط الإيرانية في الخليج والمحيط الهندي".
كما يشير عطوان إلى قرار المرشد الأعلى للثورة الإيرانية علي خامنئي بتعيين الجنرال حسين سلامي قائدا جديدا للحرس الثوري خلفا للجنرال محمد علي جعفري، وبعد أيام من تصنيف الولايات المتحدة الحرسَ الثوري الإيراني كحركة إرهابية، قائلا إن هذا القرار "قد يكون في إطار الاستعدادات لهذه الحرب، فهو يُعتبر من جناح 'الصقور' في المؤسسة العسكرية الإيرانية، وهدد بإزالة إسرائيل من الوجود".
ويؤكد الكاتب أن "البنى التحتية للمواجهة في جنوب لبنان اكتملت ومعها قوة الردع الصاروخية الهائلة، فجبال لبنان الشامخة تخفي في جوفها مدناً وقرى ومصانع للصواريخ الدقيقة".
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